जन्मपत्री अध्ययन

जन्म कुंडली व्यक्ति के जीवन की घटनाओ की संभावना बताती है कि आने वाला समय कैसा हो सकता है | जीवन में कौन सा समय अच्छा तो कौन सा समय व्यक्ति के लिए बुरा हो सकता है आदि बातों का पूर्वानुमान इस विद्या के द्वारा लगाने का प्रयास किया जाता है ताकि व्यक्ति संभल सके, वैसे तो व्यक्ति का भाग्य पहले ही लिखा जा चुका होता है लेकिन फिर भी कुण्डली के माध्यम से बुरी बातों का प्रभाव जप-तप आदि द्वारा कम करने का प्रयास किया जाता है |

जन्मकुंडली एक समय विशेष पर आकाश में विचरते ग्रहों का एक नक्शा है जिसे जन्म कुंडली में उतारा जाता है जिससे एक समय विशेष पर ग्रहो की स्थिति का पता चलता है कि कौन सा ग्रह किस राशि अथवा भाव में गोचर कर रहा है. हर जन्म कुंडली में बारह खाने बने होते हैं जिन्हें भाव कहा जाता है. इस तरह से हर कुण्डली में बारह भाव होते हैं जिनकी अपनी विशेष भूमिका होती है.

जन्म कुंडली बनाने के लिए बारह राशियों का उपयोग होता है क्योंकि भाव बारह हैं तो हर भाव में एक राशि का अपना आधिपत्य होता है. इस तरह से बारह अलग भावों में बारह अलग राशियाँ आती है. जन्म के समय भचक्र पर जो राशि उदय होती है वह कुंडली के पहले भाव में आ जाती है और पहला भाव व्यक्ति का लग्न हो जाता है और लग्न में जो राशि आती है उसका स्वामी लग्नेश कहलाता है. अन्य राशियाँ फिर क्रम से विपरीत दिशा में चलती है. माना पहले भाव में कर्क राशि आती है तब दूसरे में सिंह राशि आएगी और बाकी इसी क्रम से चलते हुए बारहवें भाव में मिथुन राशि आएगी.

जन्म कुंडली में बारह भाव होते हैं और सभी भाव जीवन के किसी ना किसी क्षेत्र से संबंध रखते हैं. जिस भाव में जो राशि होती है उसका स्वामी उस भाव का भावेश कहलाता है. हर भाव में भिन्न राशि आती है लेकिन हर भाव का कारक निश्चित होता है इसलिए भाव, भावेश तथा भाव के कारक का अध्ययन जरुर करना चाहिए कि वह कुण्डली में किस अवस्था में है.

कुण्डली में पहले, पांचवें तथा नवें भाव को अत्यधिक शुभ माना गया है और इन्हें त्रिकोण स्थान कहा गया है. फिर चौथे,सातवें, दसवें भाव को त्रिकोण से कुछ कम शुभ माना गया है और इन्हें केन्द्र स्थान कहा गया है. पहले भाव को त्रिकोण तथा केन्द्र दोनों का ही दर्जा दिया गया है. तीसरे, छठे तथा एकादश भाव को त्रिषडाय का नाम दिया गया है और इन्हें अशुभ भाव ही कहा गया है. दूसरे, आठवें तथा बारहवें भाव को सम कहा गया है लेकिन आठवें व बारहवें भाव में समता जैसी कोई बात दिखाई नहीं देती है बल्कि आठवां भाव तो सदैव रुकावट देता है. यह भाव कई बातों में अशुभ होने के साथ कई बार शुभता भी दे देता है. शायद इसी वजह से इस भाव को सम कहा गया है.

ग्रह स्थिति का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण है. ग्रह जिस राशि में स्थित है वह उसके साथ कैसा व्यवहार करती है अर्थात ग्रह मित्र राशि में स्थित है या शत्रु राशि मं स्थित है. ग्रह उच्च, नीच, मूल त्रिकोण या स्वराशि में है | ग्रह, कुंडली के अन्य कौन से ग्रहों से संबंध बना रहा है. जिनसे संबंध बना रहा है वह शुभ हैं या अशुभ हैं | जन्म कुंडली में ग्रह किसी तरह के योग में शामिल है या नहीं.

जो ग्रह स्थिति आप जन्म कुण्डली में देख रहे हैं उन्हें नवांश कुण्डली में जरुर देखें क्योंकि कई बार जन्म कुण्डली का बली ग्रह नवांश में जाकर कमजोर हो जाता है तब अच्छे फलों की प्राप्ति नहीं होती है | जिस भाव के फल देखने हैं तो उस भाव से संबंधित वर्ग कुंडली का अध्ययन करें. उदाहरण के लिए यदि संतान संबंधी फल देखने हैं तब जन्म कुण्डली के पंचम भाव, पंचमेश तथा संतान का कारक ग्रह गुरु का जन्म कुण्डली में तो अध्ययन करेगें ही, साथ ही इन सभी को सप्तांश कुंडली में भी देखेगें कि यहाँ इनकी क्या स्थिति है. साथ ही सप्तांश कुंडली के लग्न, लग्नेश, पंचम भाव, पंचमेश का भी अध्ययन करेगें. जितनी कम पीड़ा उतना अच्छा फल होगा.

यह देखें कि जन्म कुंडली में किस ग्रह की दशा चल रही है. जिस ग्रह की दशा चल रही है वह किस भाव का स्वामी है और कहाँ स्थित है, देखें. महादशा नाथ और अन्तर्दशानाथ आपस में मित्र है या शत्रु हैं, देखें. कुंडली के अध्ययन के समय महादशानाथ से अन्तर्दशानाथ किस भाव में है, देखें. उदाहरण के लिए महादशानाथ जिस भाव में स्थित है तो उस भाव से अन्तर्दशानाथ कौन से भाव में आता है, यह देखें. माना महादशानाथ पांचवें भाव में है और अन्तर्दशानाथ बारहवें भाव में है तब दोनों ग्रह एक – दूसरे से 6/8 अक्ष पर स्थित होगें, इसे षडाष्टक योग भी कहा जाता है जो कि शुभ फल देने वाला नहीं होगा. इसी तरह से यदि महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ आपस में शत्रुता का भाव रखते हैं तब भी शुभ फलों में कमी हो सकती है. शुभ फल मिलने के लिए या किसी कार्य की सिद्धि होने के लिए महादशानाथ, अन्तर्दशानाथ तथा प्रत्यंतरदशानाथ में से किन्हीं दो का आपस में मित्र होना जरुरी है.

दशा के अध्ययन के साथ गोचर का अपना महत्वपूर्ण स्थान होता है. किसी काम की सफलता के लिए अनुकूल दशा के साथ अनुकूल गोचर भी आवश्यक है. किसी भी महत्वपूर्ण घटना के लिए शनि तथा गुरु का दोहरा गोचर जरुरी है. ये दोनो ग्रह जब किसी भाव अथवा भाव स्वामी को एक साथ दृष्ट करते हैं तब उस भाव के फल मिलने का समय शुरु होता है लेकिन संबंधित भाव के फल तभी मिलेगें जब उस भाव से संबंधित दशा भी चली हुई हो | यदि दशा अनुकूल नहीं होगी केवल ग्रहों का गोचर हो रहा होगा तब भी फलों की प्राप्ति नहीं होती है.<br>